चैत्र नवरात्रि 2026: महत्व, पूजा विधि और घटस्थापना मुहूर्त
मंगल - 25 मार्च 2025
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चैत्र नवरात्रि नौ दिनों का पावन पर्व है, जिसमें देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। यह उत्सव मुख्य रूप से माँ दुर्गा के भक्तों द्वारा अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। भारत के कुछ क्षेत्रों में इसे ‘गणगौर’ के नाम से भी जाना जाता है। माँ दुर्गा को सम्मानित करने के लिए भक्त इन नौ दिनों तक व्रत रखते हैं। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास में मनाया जाता है, जो प्रायः मार्च या अप्रैल में पड़ता है। नौवें दिन भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव, अर्थात राम नवमी, के साथ चैत्र नवरात्रि का समापन होता है।
विषय सूची
- चैत्र नवरात्रि के बारे में
- चैत्र नवरात्रि कब से कब तक है?
- घटस्थापना का अर्थ और घटस्थापना मुहूर्त
- चैत्र नवरात्रि का महत्व
- चैत्र नवरात्रि व्रत और इसके लाभ
- चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि में क्या अंतर है?
- चैत्र नवरात्रि में विशेष मंदिर पूजा
- नवरात्रि में अर्पित की जाने वाली पूजाएँ

चैत्र नवरात्रि के बारे में
चैत्र नवरात्रि हिंदुओं का एक प्रमुख पर्व है, जो अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। इस दौरान भक्त नवदुर्गा की आराधना करते हुए व्रत रखते हैं। इस पर्व में विशेष परंपराएँ निभाई जाती हैं, जैसे गणगौर पूजा और समृद्धि तथा सुरक्षा की कामना हेतु विशेष प्रार्थनाएँ। यह उत्सव आध्यात्मिक ऊर्जा, भक्ति और आस्था का अद्भुत संगम है।
चैत्र नवरात्रि कब से कब तक है?
हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र नवरात्रि 19 मार्च 2026 से प्रारंभ होकर 27 मार्च 2026 तक मनाई जाएगी। घटस्थापना 19 मार्च को की जाएगी।
घटस्थापना का अर्थ और घटस्थापना मुहूर्त
नवरात्रि के दौरान किया जाने वाला पहला और सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान घटस्थापना है। ‘घट’ का अर्थ कलश और ‘स्थापना’ का अर्थ स्थापित करना है। इसका अर्थ है कलश के माध्यम से माँ दुर्गा का आह्वान करना।
भक्त कलश में मिट्टी, जल, जौ के बीज और गोबर रखते हैं। कलश के ऊपर नारियल स्थापित किया जाता है। इसके बाद नौ दिनों तक उस कलश की पूजा की जाती है। दसवें दिन कलश विसर्जन किया जाता है।
घटस्थापना मुहूर्त
ज्योतिषियों के अनुसार, 19 मार्च को घटस्थापना का शुभ समय प्रातः 06:52 बजे से 07:43 बजे तक है। इस अवधि में घटस्थापना करना शुभ रहेगा। इसके अतिरिक्त अभिजीत मुहूर्त में दोपहर 12:05 बजे से 12:53 बजे के बीच भी घटस्थापना की जा सकती है।
चैत्र नवरात्रि का महत्व
हिंदू संस्कृति में चैत्र नवरात्रि का विशेष महत्व है और इसे अत्यंत श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है और नए आरंभ तथा नवचेतना का संदेश देता है। मान्यता है कि इस अवधि में देवी दुर्गा की दिव्य शक्ति अपने चरम पर होती है। उनकी उपासना से भक्त उनके आशीर्वाद और संरक्षण की प्राप्ति करते हैं।
चैत्र नवरात्रि आध्यात्मिक जागरण और आत्मिक विकास का भी शुभ समय माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि व्रत, उपासना और साधना के माध्यम से मन, शरीर और आत्मा की शुद्धि होती है। यह पर्व सांस्कृतिक और क्षेत्रीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत के विभिन्न राज्यों और समुदायों में इसे अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है।
नवरात्रि के दौरान गरबा और डांडिया जैसे लोकनृत्य भी किए जाते हैं। लोग पारंपरिक वेशभूषा धारण कर समूह में ढोल और संगीत की धुन पर नृत्य करते हैं। यह नृत्य केवल आनंद का माध्यम ही नहीं, बल्कि देवी दुर्गा की दिव्य ऊर्जा को समर्पित श्रद्धांजलि भी है।
नवरात्रि का समापन राम नवमी के रूप में होता है। इस दिन भक्त रामायण का पाठ और श्रवण करते हैं, जो भगवान राम के जीवन और रावण पर उनकी विजय की गाथा है। यह परंपरा धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और धर्म, भक्ति तथा साहस के मूल्यों को सुदृढ़ करती है।
चैत्र नवरात्रि व्रत और इसके लाभ
चैत्र नवरात्रि अपने साथ अनेक विशेष रीति-रिवाज और परंपराएँ लेकर आती है। व्रत के दौरान भक्त कुछ नियमों का पालन करते हैं:
- भक्त मांस, मदिरा और अनाज का सेवन नहीं करते।
- वे सात्त्विक आहार ग्रहण करते हैं, जिसमें फल, सब्जियाँ और दुग्ध उत्पाद शामिल होते हैं।
- नौ दिनों तक व्रत रखा जाता है, और कई लोग पहले और अंतिम दिन पूर्ण उपवास रखते हैं।
व्रत के लाभ
नवरात्रि में व्रत का विशेष महत्व है, क्योंकि इसे मन, शरीर और आत्मा की शुद्धि का माध्यम माना जाता है। यह आध्यात्मिक उन्नति और देवी दुर्गा की दिव्य ऊर्जा से जुड़ने का मार्ग है।
व्रत के दौरान ध्यान देना चाहिए कि:
- सात्त्विक, हल्का और सुपाच्य भोजन करें।
- मसाले और अनाज से परहेज रखें।
व्रत त्याग और आत्मसंयम का प्रतीक है। यह हमें अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सिखाता है। यह केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि नकारात्मक विचारों और बुरी आदतों का भी त्याग है।
नवरात्रि में व्रत रखने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और शरीर का शुद्धिकरण होता है। इससे पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है और शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है। कई लोग नौ दिनों के व्रत के बाद स्वयं को अधिक हल्का, ऊर्जावान और मानसिक रूप से प्रसन्न अनुभव करते हैं।
चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि में क्या अंतर है?
नवरात्रि वर्ष में दो बार प्रमुख रूप से मनाई जाती है। दोनों में मातृशक्ति की आराधना की जाती है, परंतु उनका महत्व भिन्न है।
पहली नवरात्रि चैत्र मास में मनाई जाती है, जिसे चैत्र नवरात्रि कहते हैं। इसे हिंदू नववर्ष की शुरुआत भी माना जाता है।
दूसरी नवरात्रि आश्विन मास में आती है, जिसे शारदीय नवरात्रि कहा जाता है। बंगाल में इसे दुर्गा पूजा के रूप में भव्यता से मनाया जाता है।
इसके अतिरिक्त पौष और आषाढ़ मास में भी गुप्त नवरात्रि मनाई जाती है, जिसमें विशेष रूप से तंत्र साधना की जाती है।
चैत्र नवरात्रि में विशेष मंदिर पूजा
नवरात्रि के दौरान देश के कई प्रसिद्ध मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, जिससे माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है।
माँ कामाख्या मंदिर – यह सभी शक्तिपीठों का महापीठ माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ माता सती का ‘योनि’ भाग गिरा था। यहाँ ‘माँ कामाख्या तंत्र सिद्धि संकल्प’ पूजा की जाती है, जिससे भक्तों को माँ का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
अकालिपुर मंदिर – यह मंदिर माँ काली को समर्पित है। नवरात्रि में ‘अकालिपुर गुह्य काली भोग दान सेवा’ विशेष पूजा की जाती है। माँ काली भक्तों को स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।
तारापीठ मंदिर – यह भारत के सिद्धपीठों में से एक है। यहाँ माता सती की तीसरी आँख (तारा) गिरी थी। नवरात्रि में ‘माँ तारा श्रृंगार पूजा’ की जाती है, जिससे भक्तों को साहस और सुरक्षा प्राप्त होती है।
दुर्गा कुंड मंदिर (वाराणसी) – यहाँ माँ दुर्गा की पूजा यंत्र रूप में की जाती है। नवरात्रि में ‘काशी दुर्गा कुंड नाम गोत्र संकल्प’ पूजा की जाती है।
कालीघाट मंदिर (कोलकाता) – 200 वर्ष पुराना यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ माता सती का दाहिना पैर का अंगूठा गिरा था। नवरात्रि में ‘कालीघाट सुख समृद्धि पूजा’ की जाती है।
वराही माता मंदिर – माँ वराही सप्तमातृकाओं में से एक हैं। नवरात्रि में ‘वराही माता और गणेश पूजा’ की जाती है, जिससे बाधाएँ दूर होती हैं।
माँ चिंतपूर्णी मंदिर – यह भी 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहाँ माता सती का मस्तक गिरा था। यहाँ ‘माँ चिंतपूर्णी अरदास और चुनरी अर्पण सेवा’ की जाती है।
माँ बगलामुखी मंदिर – दस महाविद्याओं में नौवें स्थान पर विराजमान माँ बगलामुखी को अत्यंत शक्तिशाली देवी माना जाता है। ‘बगलामुखी शत्रु विनाशक श्रृंगार’ पूजा विशेष रूप से की जाती है।
महालक्ष्मी मंदिर (कोल्हापुर) – यहाँ माँ महालक्ष्मी को ‘अंबाबाई’ के नाम से पूजा जाता है। नवरात्रि में ‘महालक्ष्मी धन समृद्धि नैवेद्य सेवा’ की जाती है, जिससे समृद्धि की प्राप्ति होती है।
नवरात्रि में अर्पित की जाने वाली पूजाएँ
माँ दुर्गा के सच्चे भक्तों के लिए ये नौ दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। यदि कोई भक्त प्रतिदिन तीर्थ स्थान पर जाकर पूजा नहीं कर पाता, तो उत्सव ऐप आपके लिए आशा की किरण है। अब आप अपने स्थान से ही अपने नाम और गोत्र से पूजा करवा सकते हैं।
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